अरावली पर्वतमाला पर क्यों मचा है बवाल: क्या केन्द्र सरकार की नई नीति से पश्चिमी भारत में खनन बढ़ेगा, रेगिस्तानी इलाका बढ़ने के दावों में कितनी सच्चाई; क्या है पूरा मामला
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तस्वीर 13 दिसंबर की है। अरावली दिवस के दिन अरावली पर्वतमाला की ही एक पहाड़ी पर इसे क्लिक किया गया। अरावली की पहचान के नए पैमाने सामने आने के बाद दिल्ली-NCR के स्कूलों के हजारों बच्चे 'अरावली बचाओ' मुहिम का हिस्सा बने। (फोटो सोर्स: ANI)
नेशनल डेस्क। #SaveAravali बीते कुछ हफ्तों से ट्रेंड कर रहा है। सोशल मीडिया पर लोग इस हैशटैग के साथ अरावली पर्वत श्रृंखला के फोटो डाल रहे हैं। संसद में कांग्रेस नेता अजय माकन अरावली पहाड़ियों को बचाने की अपील करते दिखे हैं तो राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इस मुद्दे पर रेगिस्तान के दिल्ली तक फैल जाने के दावे कर रहे हैं।
इन सब के बीच राजस्थान में बड़े आंदोलन की आहट मिली है। 24 दिसंबर से प्रदेशभर में अरावली आंदोलन की शुरुआत होगी। माउंट आबू से लोगों का समूह पैदल जनयात्रा निकालेगा, जो गांव-गांव और गली-गली घूमते हुए लोगों को अरावली बचाने के लिए एकजुट करेगा। यह यात्रा करीब 1000 किमी तक होने की बात कही जा रही है।
दूसरी ओर, सेव अरावली ट्रस्ट ने इसके लिए एक हस्ताक्षर अभियान चलाया है। इसमें 25 हजार से ज्यादा लोगों ने हस्ताक्षर कर केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को अरावली पर सरकार का रवैया बदलने की मांग की है।
कुल मिलाकर सोशल मीडिया से शुरू हुआ यह आंदोलन अब गांव-शहर की सड़कों पर पसर रहा है। विपक्षी पार्टियां भी लामबंद हो रही हैं। केन्द्र सरकार भी इस मामले पर अपना पक्ष रख चुकी है लेकिन बात सुलझते नजर नहीं दिख रही। आखिर ये सब क्या है और अचानक अरावली बचाने की बातें क्यों हो रही हैं? इन्हीं सब सवालों के जवाब इस आर्टिकल में मिलेंगे…
मामला कहां से शुरू हुआ?
20 नवंबर यानी पूरे एक महीने पहले सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से इस मामले की शुरुआत हुई। चीफ जस्टिस बीआर गवई ने रिटायर होने के ठीक पहले अपना आखिरी जजमेंट सुनाया कि अरावली में अब खनन के लिए नए सिरे से लीज नहीं दी जाएगी। यह फैसला वैसे तो खुशखबरी वाला था लेकिन इसके पीछे एक और एंगल भी था।
दरअसल, इस निर्देश के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की एक कमिटी की उस रिपोर्ट को भी स्वीकार किया था, जिसमें अरावली पर्वतमाला को नए सिरे से परिभाषित किया गया है। इसमें स्पष्ट लिखा था कि अरावली हिल्स में कौन-से इलाके शामिल होंगे और कौन से नहीं। बस यही परिभाषा जब सामने आई तो बवाल शुरू हो गया।
क्या है अरावली की नई परिभाषा?
बीते एक दशक से ज्यादा वक्त से फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) अरावली की पहचान के लिए 3-डिग्री ढलान का मानक इस्तेमाल करता रहा है। 2024 में बनी टेक्निकल कमेटी ने इसे बदलकर 4.57 डिग्री ढलान कर दिया। ऊंचाई की सीमा भी 30 मीटर कर दी गई। यह 30 मीटर समुद्र तल से नहीं बल्कि आसपास के ग्राउंड लेवल से थी। हालांकि इससे अरावली पर्वतमाला का करीब 40% हिस्सा कवर हो रहा था। लेकिन हाल ही में जब केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अरावली की नई परिभाषा दी तो इसमें ऊंचाई की सीमा 100 मीटर कर दी गई। यानी वह भू-भाग, जो अपने आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है, उसे अरावली पहाड़ी माना जाएगा। ढलान (4.57 डिग्री) और आसपास के इलाकों से ऊंचाई (100 मीटर) के नए बेंचमार्क से वास्तविक अरावली हिल्स का 90% हिस्सा पहचान से बाहर होने की आशंका है।
तो इसमें विवाद क्या है?
अरावली पर्वत श्रृंखला दिल्ली से लेकर गुजरात तक फैली हुई है। इसमें हरियाणा और राजस्थान का बड़ा इलाका भी शामिल है। इस श्रृंखला की पहाड़ियां करीब 2 करोड़ साल पुरानी हैं। भू-वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह लंबी-चौड़ी पर्वतमाला सदियों से भारत के एक बड़े भू-भाग को रेगिस्तान होने से बचाती रही है। मध्य और उत्तर-पश्चिमी भारत की इकोलॉजी, जलवायु और जैव विविधता में इन पहाड़ियों का खास योगदान रहा है। यही कारण है कि यह पहाड़ियां संरक्षित हैं। यानी, इन पर गैर जरूरी खनन और कंस्ट्रक्शन पर सख्ती है।
अब अगर नई परिभाषा में अरावली का हिस्सा सीमित कर दिया जाता है तो इसका मतलब है कि बाकी हिस्से पर खनन और कंस्ट्रक्शन की अनुमति लेने में ज्यादा परेशानी नहीं होगी। यह भी स्पष्ट है कि खनन के चलते पहाड़ियां हमेशा मैदान में तब्दील हो जाती हैं। ऐसे में अरावली अगर खत्म हो जाएगी तो भारत के पश्चिमी हिस्से के एक बड़ा भू-भाग की इकोलॉजी और जलवायु में आश्चर्यजनक बदलाव देखने को मिलेगा। यही कारण है कि यह विवाद गहराता जा रहा है।
नई परिभाषा से अरावली पहाड़ियां कितनी सीमित हो गईं?
अरावली पर्वतमाला चार राज्यों के 37 जिलों में फैली हुई है। इंडियन एक्सप्रेस ने FSI के आंतरिक आकलन रिपोर्ट के हवाले से लिखा है कि 15 जिलों में 12,081 पहाड़ियों ऐसी हैं, जिनकी ऊंचाई 20 मीटर या उससे ज्यादा है। केवल 1,048 पहाड़ियां ऐसी हैं, जो 100 मीटर से ऊपर हैं। यह कुल पहाड़ियों का 9% भी नहीं है। इससे समझा जा सकता है कि अरावली की नई परिभाषा से इस संरक्षित क्षेत्र का 91% हिस्सा खनन और कंस्ट्रक्शन के लिए खुल जाएगा।
कमिटी के एफिडेविट में और क्या खास बातें हैं?
- सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गए कमिटी के एफिडेविड में लिखा गया है कि 34 अरावली जिलों में से 12 में ढलान 3 डिग्री से कम है। ऐसे में FSI का तीन डिग्री वाले पुराने फॉर्मुले के तहत भी इन जिलों की पहाड़ियां अरावली में नहीं आएंगी। इन जिलों का ज्यादातर हिस्सा मैदानी है।
- अरावली के जो भी जिले हैं, उन सभी की समुद्र तल से ऊंचाई 100 मीटर से ज्यादा हैं। जबकि पहाड़ियों की ऊंचाई उसके आसपास स्थित इलाकों से मापी जानी चाहिए। उदाहरण के लिए अगर कोई पहाड़ी समुद्र तल से 190 मीटर ऊंची है, तो वह अरावली नहीं मानी जाएगी क्योंकि उस इलाके की औसत ऊंचाई ही 100 मीटर है। यानी आसपास के इलाके से पहाड़ी की ऊंचाई महज 90 मीटर हुई। ऐसे में वह मंत्रालय के 100 मीटर ऊंचाई वाले पैमाने पर नहीं बैठती।
- चार राज्यों में से सिर्फ राजस्थान में ही अरावली में खनन रोकने के लिए नियमावली बनी हुई है। इसके तहत 100 मीटर ऊंची और 3 डिग्री ढलान से ज्यादा वाली पहाड़ियों पर खनन प्रतिबंधित हैं। नया पैमाना भी इन्हीं मानकों को देखते हुए चारों राज्यों के लिए तय किया गया है।
क्या असर होगा?
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, FSI ने सितंबर 2025 में पर्यावरण सचिव को एक रिपोर्ट दी थी। इसमें जिलेवार अरावली पहाड़ियों के नक्शे और कुछ फैक्ट थे। इसी में यह भी लिखा गया था कि 10 से 20 मीटर ऊंचाई वाली पहाड़ियां भी तेज हवाओं और धूल के कण को एक ओर से दूसरी ओर जाने से रोकती हैं। यानी इन्हें भी संरक्षित करने की जरूरत है।
अखबार की इसी रिपोर्ट में पर्यावरण मंत्रालय के एक अधिकारी के हवाले से बताया गया कि नए मानकों से निचली पहाड़ियां खतरे में होंगी। यह अगर संरक्षित नहीं रहीं और खुदाई होने लगीं तो रेत और धूल के कण थार मरुस्थल से उपजाऊ मैदानी इलाकों में बहने लगेंगे। शुरुआत में इससे फसलें यानी किसानों की आर्थिक हालत पर असर पड़ेगा। बाद में यह लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर डालेगी। यहां तक कि दिल्ली-एनसीआर तक इससे प्रदूषण और बढ़ जाने की संभावना होगी।
सरकार का जवाब क्या है?
भूपेन्द्र यादव ने रविवार को इस मामले में सफाई दी। उन्होंने कहा- कुल अरावली रेंज 1.47 लाख वर्ग किलोमीटर है। महज 2 फीसदी पर ही खनन हो सकता है और यह भी पूरी स्टडी के बाद संभव होगा। सुप्रीम कोर्ट ने हमें कहा था कि झारखंड में सारांडा की तरह ही अरावली के लिए भी एक सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तैयार किया जाए और इसके बाद ही खनन की परमिशन दी जाए।
उन्होंने कहा- न तो दिल्ली में किसी तरह के खनन की कोई अनुमति दी जाएगी और न ही इस रेज में आने वाले 20 से ज्यादा रिजर्व फॉरेस्ट पर कोई खनन होगा। अरावली के जो भी इलाके संरक्षित है, वह संरक्षित ही रहेंगे। नए मानकों का मतलब यह नहीं कि अरावली से बाहर हुए इलाकों में खनन की परमिशन मिल जाएगी। जब तक पूरी स्टडी नहीं हो जाती तब तक नए खनन के लिए भी कोई परमिशन नहीं मिलेगी।
उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाई जा रही हैं। नई परिभाषा से 90% अरावली इलाका संरक्षित होगा न कि खनन के लिए खुल जाएगा।

