सरकारी के मुकाबले प्राइवेट हॉस्पिटल 8 गुना महंगा क्यों: इंश्योरेंस बढ़ा लेकिन मरीज की जेब खाली कैसे हो रही; संसदीय समिति की रिपोर्ट में क्या-क्या जवाब मिले
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स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर संसद की स्टैंडिंग कमिटी की 176वीं रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि प्राइवेट हॉस्पिटल में इलाज का खर्च आम लोगों की कैपिसिटी से बाहर हो रहा है। (फोटो सोर्स: Reuters)
नेशनल डेस्क। अगर किसी बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़े तो सरकारी और प्राइवेट अस्पताल के खर्च में कितना फर्क हो सकता है? क्या प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराना सरकारी के मुकाबले कई गुना महंगा है? और अगर ऐसा है तो देश में बड़ी संख्या में लोग प्राइवेट अस्पतालों का रुख क्यों करते हैं?
इन सवालों का जवाब हाल ही में संसद में पेश हुई एक रिपोर्ट से मिलता है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर बनी संसद की स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी अस्पताल में एडमिट होने पर मरीज का जितना खर्च होता है, उससे 8 गुना ज्यादा खर्च प्राइवेट हॉस्पिटल में हो रहा है। यह भी खुलासा हुआ कि बीमा सेक्टर में बढ़ोतरी के बावजूद इलाज के खर्च का ज्यादातर हिस्सा मरीज के हिस्से ही आ रहा है।
सरकारी और प्राइवेट अस्पताल के खर्च में कितना फर्क है?
रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि सरकारी और प्राइवेट अस्पताल में भर्ती होने के खर्च के बीच 7.6 गुना अंतर है। जिस इलाज के लिए सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 6,631 रुपये खर्च होते हैं, उसी तरह के इलाज के लिए प्राइवेट अस्पताल में 50,508 रुपये देने पड़ते हैं।
संसदीय समिति ने बताया है कि बच्चे के जन्म, कैंसर, दिल की बीमारी और किडनी डिसीज जैसे मामलों में सरकारी और प्राइवेट अस्पताल के खर्च में बड़ा अंतर देखने को मिलता है।
यानी गंभीर बीमारी या लंबे इलाज की जरूरत पड़ने पर प्राइवेट अस्पताल का बिल परिवार की आर्थिक स्थिति पर बुरी तरह असर डालता है।

जब प्राइवेट अस्पताल इतने महंगे हैं तो लोग वहां क्यों जाते हैं?
रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी अस्पतालों में कई जगह बेड, जरूरी इक्विपमेंट, रखरखाव और कर्मचारियों की कमी है। खासकर गांवों और दूर-दराज के इलाकों में यह समस्या ज्यादा दिखाई देती है।
ऐसे में मरीजों के सामने अक्सर दो विकल्प रह जाते हैं- सरकारी अस्पताल में सीमित सुविधाओं के बीच इलाज का इंतजार करें या ज्यादा पैसे देकर प्राइवेट अस्पताल जाएं। गंभीर मामलों में लोग इंतजार करना पसंद नहीं करते। यही कारण है कि ज्यादातर भीड़ प्राइवेट अस्पतालों की ओर डाइवर्ट हो जाती है।
प्राइवेट अस्पताल में इलाज महंगा क्यों?
संसदीय समिति के मुताबिक, प्राइवेट हॉस्पिटल के अनाप-शनाप बिल की वजह सिर्फ सुविधाएं नहीं नहीं बल्कि बिलिंग सिस्टम भी है। संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, प्राइवेट अस्पतालों में बिलिंग में पारदर्शिता की कमी, जरूरत से ज्यादा जांच और एक ही प्रोसेस के लिए अलग-अलग अस्पतालों में अलग-अलग चार्ज होते हैं। इस कारण भी इलाज महंगा होता जा रहा है।
क्या प्राइवेट अस्पताल हर जगह आसानी से उपलब्ध हैं?
नहीं। यहां एक और बड़ी समस्या सामने आती है। संसदीय समिति के मुताबिक, प्राइवेट हेल्थकेयर का बड़ा हिस्सा शहरों में ही है। छोटे शहरों, कस्बों, गांवों, पहाड़ी और आदिवासी इलाकों में बड़े और आधुनिक अस्पतालों की कमी है।
यानी जिन इलाकों में लोगों की आय कम है और स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत ज्यादा है, वहां अच्छे प्राइवेट अस्पताल मौजूद ही नहीं हैं।
इसका नतीजा यह होता है कि मरीज को बेहतर इलाज के लिए बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। इससे इलाज के खर्च के साथ-साथ यात्रा और रहने का खर्च भी बढ़ जाता है।

बीमा बढ़ने के बाद भी जेब से पैसा क्यों?
भारत में हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज लगातार बढ़ रहा है, लेकिन रोजमर्रा के इलाज, डॉक्टर की फीस, टेस्ट, दवाओं और OPD जैसे खर्चों का बड़ा हिस्सा कई पॉलिसियों में पूरी तरह कवर नहीं होता। ऐसे में इंश्योरेंस होने के बावजूद ट्रीटमेंट का एक बड़ा खर्च मरीज की जेब पर पड़ता है।
एक आंकड़ा यह भी है कि बीमा सेक्टर में ग्रोथ के बावजूद ग्रामीण और शहरी परिवारों में हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज करीब 47% और 44% बताया गया है। 2025 के NSS सर्वे में यह आंकड़ा सामने आया था। यानी अभी भी देश में आधे से ज्यादा लोग इंश्योरेंस पॉलिसी नहीं लेते हैं।
स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अस्पताल में भर्ती होकर इलाज कराने का औसत खर्च करीब 37,858 रुपये है। इसमें से करीब 34,064 रुपये मरीज या उसके परिवार को अपनी जेब से देने पड़ते हैं।
सरकार से क्या चाहती है संसदीय समिति?
समिति का मानना है कि आधुनिक और बेहतर इलाज सिर्फ बड़े शहरों के कॉरपोरेट अस्पतालों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। गांव, छोटे शहर, पहाड़ी और आदिवासी इलाकों के लोगों को भी अच्छी और किफायती स्वास्थ्य सुविधाएं मिलनी चाहिए। इसके लिए छोटे और मझोले अस्पतालों को मजबूत करना जरूरी है। समिति ने सुझाव दिया है कि सरकार:
- ग्रामीण और छोटे शहरों के अस्पतालों को आर्थिक मदद दे।
- अस्पतालों में नई तकनीक लगाने के लिए ग्रांट दी जाए।
- जरूरी मेडिकल उपकरण खरीदने में सब्सिडी दी जाए।
- पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए छोटे शहरों और गांवों में अस्पताल बढ़ाए जाएं।
- छोटे अस्पतालों को बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों के सामने खत्म होने से बचाया जाए।
यहां एक दिलचस्प बात यह है कि रिपोर्ट में सरकारी अस्पतालों की संख्या बढ़ाने और उन्हें बेहतर करने की बजाय प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का खर्च कम करने पर फोकस किया गया है।

असली समस्या क्या है?
संसदीय समिति की इस रिपोर्ट से तस्वीर काफी साफ है। भारत में इलाज की सुविधा और इलाज की कीमत दोनों बड़ी चुनौतियां हैं।
सरकारी अस्पतालों में इलाज सस्ता है, लेकिन कई जगह बेड, डॉक्टर, उपकरण और दूसरी सुविधाओं की कमी है। दूसरी तरफ प्राइवेट अस्पतालों में सुविधाएं ज्यादा मिल सकती हैं, लेकिन उनका खर्च आम परिवार की पहुंच से बाहर हो सकता है।
बेहतर प्राइवेट हॉस्पिटल भी शहरी इलाकों में ही है। ऐसे में दूर-दराज के लोगों को इलाज के लिए और ज्यादा खर्च करना पड़ता है। एक चिंता यह है कि बीमा के बावजूद लोगों को अपनी जेब से बिल भरना पड़ता है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसी तरह इलाज मिले, असली सवाल यह है कि इलाज का खर्च किस तरह कंट्रोल में रहे।
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