विधानसभा चुनाव 2023
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विधानसभा चुनाव 2023 : आम चुनाव के सेमीफाइनल से चंद दिन पहले क्या कहते है पांचों राज्यों के समीकरण?

विधानसभा चुनाव 2023 : उम्मीदवारों की सूची जारी किए जाने के बाद सभी राज्यों में दल बदल का खेल भी शुरू हो चूका है। ऐसे में चलिए जानते है कि क्या कहते है सभी राज्यों के समीकरण।

राज एक्सप्रेस। राज एक्सप्रेस। हिंदी पट्टी प्रदेशों सहित 5 राज्यों में होने वाले चुनाव की मतदान प्रक्रिया में अब ज्यादा दिन नहीं बचे है। अगले महीने की 7 तारीख से मतदान पड़ने शुरू हो जाएंगे। मतदान से लगभग एक महीने पहले राजनैतिक दल उम्मीदवारों की सूची जारी कर देती है और चुनाव प्रचार अपने चरम पर होता है लेकिन इस बार पाँचों राज्यों का समीकरण हर बीतते वक़्त के साथ बदलता हुआ नज़र आ रहा है।

5 चुनावी राज्यों में से 3 बड़े राज्यों में जहां भाजपा और कांग्रेस की प्रत्यक्ष लड़ाई है वहीं, बाकि बचे दो राज्यों में कांग्रेस की क्षेत्रीय पार्टियों से बड़ी टक्कर दिखाई दे रहीं है। बहरहाल, सभी पांचो राज्यों के राजनैतिक दलों में टिकट वितरण के बाद अंतर्कलह की आग अब अंदरूनी न रहकर सड़कों तक आ चुकी है। पार्टी द्वारा टिकट काट दिए जाने के बाद नेताओं का दल-बदल का खेल भी शुरू हो चूका है। ऐसे में चलिए जानते है कि वर्तमान में क्या कहते है सभी चुनावी राज्यों के समीकरण।

राजस्थान में दोनों ही पार्टियों में दुविधा :

राजस्थान, भारत का एकलौता ऐसा प्रदेश है जहां हर पांच साल में जनता सरकार बदल देती है। इस साल की शुरुआत में यह रिवायत फिर से रिपीट होती हुई नज़र आ रही थी लेकिन भाजपा नेताओं के अंतर्कलह, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की नाराज़गी और मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत की जन लाभकारी नीतियों ने कांग्रेस को आगे कर दिया गया है। स्थानीय मीडिया और अन्य चुनावी सर्वे के हिसाब से इस साल की शुरआत में भाजपा, कांग्रेस से कई आगे बताई जा रही थी जिसका सबसे बड़ा कारण मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट के बीच खुलेआम जुबानी हमले थे।

सचिन पायलट ने पिछले 5 साल में कई बार अपनी ही सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और अनशन भी किया था। राज्य में गेहलोत-पायलट की सियासी खींचतान के अलावा और भी ऐसे बड़े मुद्दे थे जिसने CM गेहलोत के नेतृत्व वाली सरकार बैकफुट में ला दिया था लेकिन विपक्ष को जहां इन मुद्दों को भुनाना चाहिए था वही वें अपनी पार्टी के भीतर चल रहे विरोध के कारण लड़ाई से बहार होती हुई नज़र आए रही थी। राजस्थान भाजपा अध्यक्ष सतीश पुनिया, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के बीच मनमुटाव जगजाहिर हो चूका है। ऐसा बताया जा रहा है कि जहा कांग्रेस में 2 नेताओं के बीच मुख्यमंत्री के पद को लेकर खींचतान बनी हुई है वही दूसरी तरफ भाजपा के भीतर 3-4 ऐसे नेता है जो अब जन सभा में सबके सामने मुखयमंत्री पद को लेकर अपनी दावेदारी ठोक रहे है।

बहरहाल, भाजपा इन सभी दिक्कतों को नज़रअंदाज़ कर कांग्रेस को टक्कर दे रही थी लेकिन इस दिक्कत में सबसे बड़ा इजाफा तब हुआ जब खबरे आना शुरू हुई की भाजपा आलाकमान ने राज्य में अपनी सबसे वरिष्ठम नेत्री और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को 2018 की हार के बाद से ही किनारे करना शुरू कर दिया था। इन सभी घटनाओं को ध्यान में रखते हुए चुनाव परिणाम को लेकर कई सर्वे किये गए। वर्तमान में, आलम यह है कि कांग्रेस विरोधी लहर के बावजूद भाजपा को कड़ी टक्कर देती हुई नज़र आ रही है जिसका श्रेय राजस्थान भाजपा में नेतृत्व की कमी और अशोक गेहलोत की महंगाई भत्ता और चिरंजीवी योजना जैसी अन्य जन लाभकारी योजना को दिया जा रहा है।

तेलंगाना में सबसे बड़े उलटफेर के आसार :

मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति (अभी भारत राष्ट्र समिति) ने लगातार दो बार तेलंगाना में सरकार बनायीं है। कुल 119 विधानसभा सीटों में से केसीआर की टीआरएस ने 2014 के चुनाव में 63 और 2018 के चुनाव में शानदार 88 जीत कर तेलंगाना में अपना अधिपत्य स्थापित कर दिया था लेकिन इस बार के चुनाव केसीआर सहित उनकी पूरी पार्टी की दिक्कतें बढ़ा सकता है। साल 2018 में प्रचंड जीत के बाद केसीआर, उनकी बेटी और विधायक कविता और बहुत से विधायकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगने शुरू हो गए थे जिसका असर साल 2020 में हुए ग्रेटर हैदरबाद नगर निगम चुनावों में देखने को मिला था।

जहा टीआरएस ने 2016 के नगर निगम की 150 सीटों में से जहा 99 सीटें अपने नाम की थी, वही 2020 में सांसद बंडी संजय के नेतृत्व में भाजपा ने टीआरएस और उसकी सहायक असदुद्दीन ओवैसी वाली पार्टी को पछाड़ते हुए 44 सीटें अपने नाम की।टीआरएस 99 से घटकर 56 में खसक चुकी थी। भाजपा ने साल 2014 के लोक सभा चुनाव के बाद से ही तेलंगाना में अपनी जड़ी जमाना शुरू कर दिया था। 2014 से लेकर 2020 तक उन्होंने दोनों लोक सभा और विधानसभा में अच्छा प्रदर्शन किया था जिसे देख लगने लगने लगा था कि भाजपा 2023 के विधानसभा चुनाव में कर्नाटक के बाद दक्षिण भारत का एक और दक्षिण राज्य जीतने की और बढ़ चली है लेकिन कर्नाटक में हुई भाजपा की बड़ी हार ने भाजपा के लिए सब बदलकर रख दिया।

अध्यक्ष बंडी संजय के खिलाफ पार्टी के अंदर विरोध के चलते केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी को पार्टी अध्यक्ष बनाया गया था जिसके बाद से ही भाजपा अपने पतन की ओर बढ़ने लगी। इस पतन का फ़ायदा कांग्रेस ने जमकर उठाया और सभी आकड़ों को पछाड़ते हुए प्रदेशाध्यक्ष रेवांथ रेड्डी की अगुवाई और राहुल गाँधी लगातार जन सभाओं के कारण वर्तमान में कांग्रेस सभी समीकरणों में आगे दिखाई पड़ रही है। रेवांथ रेड्डी और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने जन सभाएं कर तेलंगाना की जनता के सामने एक बेहतर और अलग विकल्प के रूप में खुद को सामने रख दिया है। फिलहाल, स्तिथि यह है कि लगभग हर जनमत सर्वेक्षणों में कांग्रेस बाकि दोनों पार्टियों से काफी आगे नज़र आ रही है। जो लड़ाई कुछ महीने पहले तक भाजपा बनाम टीआरएस थी वह अब टीआरएस बनाम कांग्रेस हो गई है।

मध्यप्रदेश में मामा ने कम किया बड़ी हार का डर :

ऐसा कहा जाता है कि भाजपा के लिए मध्यप्रदेश एक प्रयोगशाला है। 2003 से 2018 तक भाजपा ने मध्य राज्य में एक तरफ़ा राज किया था लेकिन 2018 में न्यूनतम मार्जिन वाली हार ने भाजपा की राजनीति को बदलकर रख दिया। हार के एक साल बाद भाजपा ने ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित 22 विधायकों को पार्टी में शामिल कर मार्च 2020 में सरकार तो बना ली लेकिन जनता के बीच भाजपा के लिए विरोधी लहर खत्म नहीं हुई थी। इस बार के चुनाव की तारीख आने से 6 महीने पहले तक पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में प्रचंड और ऐतिहासिक जीत की और बढ़ रही थी।

भाजपा सरकार के खिलाफ पिछले एक साल के भीतर कई बार अलग वर्गों के लोगों ने प्रदर्शन किए, परीक्षाओं में भ्रष्टाचार और पिछड़े वर्ग के साथ प्रदेश में बढ़ रहे अपराधों को बढ़ाने के आरोप लगे थे। भाजपा के खिलाफ लगभग हर वर्ग ने अपनी नारजगी जताई थी। भाजपा के खिलाफ इतनी बड़ी एंटी इंकम्बेंसी देख राजनैतिक पंडितों और विभिन्न मीडिया सर्वेक्षण में भाजपा बड़े मार्जिन से कांग्रेस से पिछड़ते हुए दिखाई पड़ रही थी लेकिन 4 बार से प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ब्रह्मास्त्र योजना ने सबके होश उड़ाकर रख दिए। उस ब्रह्मास्त्र का नाम था 'लाड़ली बहना योजना' जिसने चुनाव में वोट करने वाले 50% वर्ग यानि महिलाओं को लाभ पहुंचने और विरोधी लहर को शांत करने का काम किया। इसके आलावा पिछले 6 महीनो के भीतर सीएम शिवराज ने कई बड़ी जन सभाएं भी की जिनमे, वह प्रत्यक्ष रूप से भी महिलाओं से मिले।

बहरहाल, जब शिवराज अपनी सरकार बचाने के लिए चालें चल रहे है तो दूसरी तरफ कांग्रेस सोती हुई नज़र आई। विपक्ष के तौर पर जैसे राजस्थान ने भाजपा नाकाम साबित हुई वैसे ही मध्यप्रदेश में कांग्रेस नाकाम साबित हुईहै। चुनाव जितनी तेज़ी से पास आ रहा था उतनी ही तेज़ी से कांग्रेस अपने विज़न से भटक रही थी। कांग्रेस प्रदेश में हुए बड़े से बड़े विरोध को अपने समक्ष भुनाने में असफल रही जिसके कारण भाजपा को वापसी करने का मौका मिला। अब वर्तमान हाल यह है कि हाल ही में आए सर्वेक्षण में कांग्रेस आगे तो दिख रही है लेकिन मार्जिन 2018 चुनाव नतीजे जैसा ही प्रतीत हो रहा है।

छत्तीसगढ़ में काका जलवा रहेगा बरकरार :

मध्य भारत में भाजपा का दूसरा गढ़ कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने 15 साल से चली आ रही रमन सिंह की सरकार को पिछले चुनाव में औंधे मुँह पटखनी दी थी। 2003 से 2018 तक भाजपा ने 3 चुनाव में जीत हासिल की थी लेकिन मुख्यमंत्री रमन सिंह और अन्य कैबिनेट मंत्रियों के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी होने के कारण भाजपा को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा था। विधानसभा की कुल 90 सीटों में कांग्रेस ने 71 सीटें अपने नाम की थी। कांग्रेस द्वारा थमाई गई इस शर्मनाक हार से भाजपा आज पांच साल बाद भी उभर पाने की स्तिथि में नहीं है।

पिछले पांच साल में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपनी नीतियों से छत्तीसगढ़ को विकास की नई ऊंचाइयों तक ले जाने का कार्य किया जिससे उनकी छवि एक बेहतर मुख्यमंत्री के तौर पर स्थापित हो गई है और तो और जिसका तोड़ भाजपा अब तक खोज नहीं पाई है। सीएम भूपेश बघेल ने वैसे तो बहुत फ्लैगशिप योजनाएं निकली है लेकिन एक ऐसी योजना है जिसने उनको दोबारा छत्तीसगढ़ में लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री वो है 'गोधन न्याय योजना'। इसके तहत सरकार किसानों और पशुपालकों से 2 प्रति किलोग्राम के हिसाब से गाय का गोबर खरीदेगी। खरीद के बाद, महिला स्वयं सहायता समूह के सदस्य गाय के गोबर को वर्मीकम्पोस्ट और अन्य उत्पादों में बदल देंगे।

इस योजना ने ग्रामीण और शहरी दोनों ही जगहों में बसने वाले बेरोज़गारों गरीबो के रोजगार के नए अवसर खोला था। यही नहीं, राज्य मे सालों चली आ नक्सली हिंसा को कम करने में भूपेश बघेल सरकार बहुत हद तक कामयाब भी रही। कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ 2018 के बाद 2021 के निकाय चुनाव में भी भाजपा का सूपड़ा साफ़ किया था। अब वर्तमान स्थिति यह है कि कांग्रेस लगातार सामने आ रहे विभिन्न सर्वेक्षण में एक तरफ़ा जीत की और अग्रसर है।

ज़ोरमथांगा के लिए बढ़ सकती है मुश्किलें :

असम राज्य से 1972 में अलग होने और 1987 में पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त करने के बाद से ही मिजोरम मिज़ो नेशनल फ्रंट और कांग्रेस के बीच के घमासान का क्षेत्र बना हुआ है। 1987 के बाद से हुए 8 विधानसभा चुनावों में दोनों ही पार्टियों ने 4-4 बार मिजोरम में अपनी सरकार बनाई है। कांग्रेस मिजोरम में काफी मजबूत मानी जाती 2018 के विधानसभा चुनाव तक लेकिन पार्टी अध्यक्ष और 4 बार के मुख्यमंत्री रहे पु ललथनहवला खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी और मिज़ो नेशनल फ्रंट का भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए के साथ आने कारण कांग्रेस 2018 के चुनाव में 40 सीटों में महज़ 5 सीट जीत पाई थी। मिज़ो नेशनल फ्रंट के प्रमुख और वर्तमान मुख्यमंत्री ज़ोरमथांगा ने तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपत ली थी। बहरहाल, 2023 में ज़ोरमथांगा के मामला बिगड़ता हुआ नज़र आ रहा है।

मणिपुर में पिछले 5 महीनों से चली आ रही हिंसा ने ज़ोरमथांगा और एनडीए के बीच दूरियां बढ़ने लगी है। ज़ोरमथांगा ने मणिपुर हिंसा को लेकर केंद्र सरकार का कड़ा विरोध व्यक्त किया था और एनडीए बाहर होने की बात कही। वही दूसरी तरफ अब ज़ोरमथांगा के विरुद्ध भी एंटी इंकम्बेंसी चरम पर है जिसका फ़ायदा उठाने के लिए अब कांग्रेस कोशिश कर रही है। बहरहाल, इस चुनाव में लड़ाई 2 नहीं बल्कि 3 पार्टियों के बीच होगी जो मिजोरम के चुनाव ज्यादा रोमांचक बनाती है। कांग्रेस और एमएनएफ का मिजोरम विधानसभा में द्वयधिकार खत्म करने के लिए साल 2017 में पूर्व आईपीएस अधिकारी और कांग्रेस सांसद लालदुहोमा ने नई पार्टी ज़ोराम नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना की थी।

2018 के चुनाव में लालदुहोमा की पार्टी ने कांग्रेस को पछाड़कर दूसरे पायदान हासिल किया था। इस बार के चुनाव में राजनैतिक पंडितों और सर्वेक्षणों के हिसाब से किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत बनते दिखाई नहीं दे रही है लेकिन कांग्रेस और ज़ोराम नेशनलिस्ट पार्टी के वोट शेयर और सीटों में बड़ा इज़ाफ़ा देखने को मिल रहा है जो ज़ोरमथांगा की मुस्किले बढ़ा सकता है।

चुनाव का बिगुल बज चुका है और जनसभाएँ जोरो-शोरो से सभी पार्टियों द्वारा की जा रही है। इस बार यह पांच राज्य के चुनाव न ही सिर्फ 2024 में होने वाले आम चुनाव की दशा और दिशा को तय करेंगे बल्कि बहुत से बड़े कद्द्वार नेताओं का भविष्य भी तय कर सकता है जिसका पता हमें 3 दिसंबर को चुनाव परिणाम आते ही पता लग लग जाएगा।

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