टैरिफ वॉर US को आइसोलेट कर देगा: एक्सपर्ट बोले- इंडियन इकोनॉमी चीन की तरह एक्सपोर्ट बेस्ड नहीं; 11 हजार करोड़ की डिफेंस डील अटकी
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कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिकी ट्रेड टैरिफ प्लान से मोदी सरकार बेहद नाराज है। उसने अमेरिका से F-35 फाइटर जेट के प्रपोजल ठंडे बस्ते में डाल दिया है। (फाइल)
अमेरिका ने भारत को ट्रेड सेक्टर में सीधी चुनौती दे दी है। 30 जुलाई को प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प ने ऐलान किया कि अब भारत से आने वाले हर प्रोडक्ट पर 25% टैरिफ लगेगा। अमेरिका यह नहीं चाहता कि भारत सरकार रूस से तेल और हथियार खरीदे। इसी वजह से रिश्तों में खटास के बाद अब टकराव भी नजर आने लगा है।
दूसरी तरफ, अमेरिकी इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स भी ट्रम्प के फैसले पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं। एक एक्सपर्ट ने तो यहां तक कहा कि ट्रम्प की हरकतों से अमेरिका दुनिया में अलगथलग पड़ जाएगा। उनका कहना था कि भारत, रूस और चीन अगर एक साथ आ गए तो अमेरिका चाहकर भी उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा सकेगा। लिहाजा, डिप्लोमैटिक चैनल्स के जरिए ही इस मसले का हल खोजा जाना चाहिए।
ट्रम्प के टैरिफ वेपन की वजह से दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र अब सीधे कारोबारी टकराव की तरफ बढ़ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि भारत ने अमेरिका से F-35 फाइटर जेट डील न करने का फैसला तक कर लिया है। इसके अलावा अब अमेरिका को जवाब देने के लिए मोदी सरकार डिप्लोमैटिक और स्ट्रैटेजिक लेवल पर प्लानिंग कर रही है। इसका इशारा कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने पिछले दिनों संसद में दिया।
गोयल ने कहा था- अमेरिकी टैरिफ प्लान का बारीकी से विचार किया जा रहा है। लेकिन, एक बात तो तय है कि भारत अपने इंटररेस्ट से कोई समझौता नहीं करेगा। आइए, जानते हैं कि अमेरिका की प्रेशर टैक्टिक्स से निपटने के लिए भारत कौन-कौन से रास्ते अपना सकता है या उसके पास क्या ऑप्शन हैं।
डीफेंस डील असर
ट्रम्प के टैरिफ बढ़ाने के फैसले का असर अमेरिका के साथ भारत के साथ 11,000 करोड़ की डिफेंस डील पर पड़ सकता है। भारत अमेरिका से MQ-9B प्रीडेटर (सी गार्जियन) ड्रोन, P-8I पोसाइडन मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट खरीदने की डील कैंसल कर सकता है। अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर और चिनूक हैवी-लिफ्ट हेलिकॉप्टर खरीदने की प्लानिंग भी खटाई में पड़ सकती है।
इतना ही नहीं, भारत अमेरिका के साथ जेवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल, GE F404 और F414 जेट इंजन के प्रोडक्शन और ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी के लिए भी बात कर रहा था, हालांकि इस टैरिफ वॉर के वजह से यह सौदा भी अटक सकता है।
भारत का F-35 जेट खरीदने से इनकार !
डिफेंस डील के तहत भारत अमेरिका से 670 करोड़ रुपए के F-35 फाइटर जेट खरीदने वाला था। फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका दौरे पर गए थे। इस दौरान अमेरिका ने भारत को अपने सबसे एडवांस्ड F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स का ऑफर दिया था। मैसेज तो ये था कि दोनों देश डिफेंस सेक्टर में रिश्ते मजबूत करना चाहते हैं। हालांकि, भारत को रूस के हथियारों से दूर करना भी इसका एक हिडन एजेंडा था। इसके बदले अमेरिका ने ट्रेड डील में नरमी दिखाने की बात कही थी। हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि अब भारत ने इस डिफेंस डील को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
F-35 जेट नहीं खरीदने की दो अहम वजह
- सरकार ने अमेरिका को साफ बता दिया है कि F-35 हमारे लिए न तो जरूरी है, न ही फायदेमंद। सबसे बड़ी वजह है यह बेहद महंगा है और इसके ऑपरेशनल चैलेंज भी ज्यादा हैं। एक F-35 की कीमत करीब 80 मिलियन डॉलर है। इसके मेंटेनेंस और लॉजिस्टिक्स सिस्टम भारत के मौजूदा रूसी मूल के बेड़े से मेल नहीं खाते। यानी अगर ये विमान आते भी हैं, मेंटेनेंस में दिक्कत आएगी और इसके लिए अलग से महंगा इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना होगा। दूसरी तरफ राफेल या रूस के फाइटर जेट्स के साथ यह दिक्कत नहीं है।
- इस जेट को नहीं खरीदने का दूसरा बड़ा कारण है सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ पॉलिसी। मोदी सरकार अब हर डिफेंस डील को इस नजरिए से देखती है कि क्या उससे देश में नई टेक्नोलॉजी आएगी, क्या प्रोडक्शन लोकल लेवल पर होगा? अमेरिका ने न तो टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की कोई ठोस पेशकश की, न ही को-प्रोडक्शन पर भरोसेमंद बात की। इस मुकाबले रूस भारत को Su-57 जैसे फाइटर जेट्स की को-प्रोडक्शन की पेशकश दे रहा है, और यह भारत की पॉलिसी से पूरी तरह मेल खाती है।
भारत के पास चार अहम और आसान ऑप्शन
भारत अब चार अहम विकल्प पर काम कर रहा है। पहला- अमेरिका से टैरिफ में बराबरी मांगी जाएगी, जैसा कि जापान (15%), कोरिया (15%) और वियतनाम (20%) को मिली है। दूसरा- अमेरिकी प्रोडक्ट्स के इम्पोर्ट बढ़ाए जा सकते हैं। हालांकि अमेरिकी जेट जैसे बड़े रक्षा सौदे अभी नहीं होंगे। तीसरा- नए बाजारों की खोज होगी, जैसे यूरोप, अफ्रीका और साउथ-ईस्ट एशिया। चौथा—जिन सेक्टर्स को झटका लगेगा, उन्हें सरकार सपोर्ट दे सकती है।
फिलहाल जवाबी टैरिफ नहीं लगाएगा इंडिया
कॉमर्स एंड इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल ने संसद में साफ कर दिया है कि सरकार फिलहाल कोई जवाबी टैरिफ नहीं लगाएगी, लेकिन हर विकल्प खुला रहेगा। WTO में भारत पहले ही अधिकार सुरक्षित कर चुका है कि वो स्टील और ऑटो सेक्टर में अमेरिका के खिलाफ जवाबी कदम उठा सकता है। साथ ही, अमेरिका से चल रही ट्रेड बातचीत को पटरी से न उतरने देने की भी कोशिश जारी है। ट्रेड डील काे फाइनल करने और भारत के हक में एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिश होगी।
क्या कहते हैं ट्रेड एक्सपर्ट
ट्रेड एक्सपर्ट्स की सलाह है कि मौजूदा समय में भारत को ‘वेट एंड वॉच’ की पॉलिसी पर काम करना चाहिए और वो यही कर भी रही है। सरकार का रुख अभी तक सही रहा है। सरकार की ओर से अब तक ना कोई उकसाने वाला बयान आया है और ना ही जल्दबाजी में कोई कदम उठाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के दबाव में कृषि, डेयरी या GM फूड सेक्टर को नहीं खोलना चाहिए। इसके बजाए लॉन्ग टर्म में एक्सपोर्ट को और मजबूत करना, नए बाजार खोजना और डोमेस्टिक वैल्यू चेन को बढ़ाना ज्यादा जरूरी है।
ट्रेड वार का असर बाजार पर भी
ट्रम्प की धमकी के बाद भारतीय रुपया 0.4 प्रतिशत तक गिरा और फिर रिकवरी की। निफ्टी 50 इंडेक्स में भी शुरुआती गिरावट देखी गई। हालांकि बाजार में स्टैबिलिटी लौट आई है, लेकिन इन्वेस्टर्स का भरोसा बनाए रखना होगा। CNN के ट्रेड एक्सपर्ट गेराल्ड ऑर्नी ने कहा- ट्रम्प का यह रुख EU जैसे मामलों में देखा जा चुका है। ट्रम्प ने पहले ईयू देशों पर 30% टैरिफ की धमकी दी, फिर 15% पर समझौता कर लिया। अगर वो यही करते रहे तो अमेरिका ग्लोबल इकोनॉमी में अकेला पड़ जाएगा और इसका फायदा चीन, रूस और भारत उठाएंगे।
गेराल्ड आगे कहते हैं- इंडियन इकोनॉमी एक्सपोर्ट बेस्ड नहीं है। उनका डोमेस्टिक मार्केट इतना बड़ा है कि वो किसी भी चैलेंज का मुकाबला कर सकता है। इसलिए, ट्रम्प एडमिनिस्ट्रेशन को प्रेशर पॉलिटिक्स या प्रेशर टैकटिक्स की बजाए डिप्लोमैटिक सॉल्यूशन्स खोजने चाहिए। वर्ना अमेरिका को भी कई दिक्कतें होना तय है।

