US की आपत्ति पर भारत ने गिनाए FCRA Bill से जुड़े 5 अहम सच : जानें फॉरेन फंडिंग से लेकर NGO की संपत्ति तक के बारे में क्या कहा
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अमेरिका में भारत के एम्बेसडर विनय मोहन क्वात्रा (Vinay Mohan Kwatra ) ने FCRA Bill को लेकर पांच बड़े झूठे दावों की हकीकत बताई है।- फाइल फोटो
इंटरनेशनल डेस्क। भारत के एफसीआरए अमेंडमेंट बिल 2026 (FCRA Amendment Bill 2026) को लेकर अमेरिकी सांसदों की आपत्ति पर भारत ने जवाब दिया है। अमेरिकी सांसदों ने दावा किया कि प्रस्तावित कानून से क्रिश्चियन ऑर्गेनाइजेशन (Christian organisations), एनजीओ (NGO) और पर असर पड़ सकता है। इसके बाद भारत ने इन आरोपों को खारिज किया है।
अमेरिका में भारत के एम्बेसडर विनय मोहन क्वात्रा (Vinay Mohan Kwatra ) ने बिल को लेकर Myth vs Reality यानी भ्रम और हकीकत के जरिए पांच बड़े दावों का जवाब दिया। वहीं विदेश मंत्रालय पहले ही साफ कर चुका है कि FCRA में बदलाव भारत के कानून से जुड़ा अंदरुनी मामला है। आइए, जानते हैं कि ये बिल आखिर है क्या और भारत ने किन पांच झूठे दावों की हकीकत बताई है...
FCRA बिल आखिर है क्या
फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट (FCRA) के तहत भारत में मिलने वाले विदेशी फंड को रेगुलेट किया जाता है। NGO, एसोसिएशन और दूसरी संस्थाओं को विदेश से फंड लेने के लिए रजिस्ट्रेशन या पहले से इजाजत लेनी होती है। इसके साथ बैंकिंग, अकाउंटिंग और रिपोर्टिंग से जुड़े नियम भी लागू होते हैं। 2026 के अमेंडमेंट बिल में इसी व्यवस्था में बदलाव करने का प्रस्ताव है। बिल में विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों और विदेश से मिलने वाले फंड के मैनेमेंट के लिए एक डेजिगेनेटेड अथॉरिटी (Designated Authority) बनाने का प्रावधान है।
इस बिल पर विनय मोहन क्वात्रा ने कुल 5 अहम झूठ की हकीकत बताई है, जहां जरूरत हुई है दूसरे देशों की मिसाल भी दी है... चलिए एक-एक कर जान लेते हैं...

क्या भारत विदेशी फंडिंग बंद करना चाहता है
भारत के एम्बेसडर विनय मोहन क्वात्रा ने इस दावे को गलत बताया है कि FCRA बिल का मकसद सिविल सोशाइटी को मिलने वाली विदेशी मदद बंद करना है। क्वात्रा ने कहा- विदेशी फंड के फ्लो को रेगुलेट करना कई देशों में सामान्य व्यवस्था है। भारत में FCRA पहली बार 1976 में लाया गया था। इसे 2010 में बदला गया और 2016, 2018 और 2020 में इसमें संशोधन किए गए। क्वात्रा के मुताबिक 2026 का बिल भी पुराने कानून को मजबूत करने का एक कदम है। इसका मकसद ट्रांसपेरेंसी और बेहतर गवर्नेंस और विदेशी फंडिंग पर एक स्पष्ट कानून बनाना है।
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क्या NGO को मिलने वाला विदेशी फंड रुक जाएगा
भारत का कहना है कि ऐसा नहीं है। क्वात्रा के मुताबिक देश में हजारों संस्थाएं FCRA के तहत रजिस्टर्ड हैं और हेल्थ, एजुकेशन, डिजास्टर रिलीफ, रिसर्च और ह्यूमैनिटेरियन वर्क के लिए विदेशी फंड हासिल कर रही हैं। FCRA के तहत रजिस्टर्ड संस्थाओं को मिलने वाली विदेशी फंडिंग में बीते 14 साल में 16,810 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई है। भारत में 30 लाख से ज्यादा NGO हैं, लेकिन इनमें सिर्फ 14,450 के पास FCRA रजिस्ट्रेशन है।

NGO की संपत्ति सरकार ले लेगी
यही FCRA बिल को लेकर सबसे बड़ा विवाद है। आलोचकों का दावा है कि रजिस्ट्रेशन कैंसिल होने पर NGO, धार्मिक संस्थाओं, अस्पतालों और स्कूलों की संपत्तियां सरकार अपने कब्जे में ले सकती है। भारत का जवाब है कि फॉरेन कंट्रीब्यूशन यानी विदेशी मदद और उससे बनी संपत्तियों के स्टेट गवर्नमेंट अथॉरिटी में जाने का प्रावधान 2010 से ही मौजूद है। 2026 के बिल में नई बात यह है कि ऐसी संपत्तियों की सुरक्षा के लिए डेजिगनेटेड अथॉरिटी बनाई जाएगी। अगर संस्था दोबारा अपना रजिस्ट्रेशन करवा लेती है, तो उसकी संपत्ति और इस्तेमाल नहीं हुआ फंड वापस कर दिया जाएगा।
क्या FCRA बिल किसी धर्म को टारगेट है
भारत ने इस आरोप को भी पूरी तरह खारिज किया है। क्वात्रा ने कहा कि FCRA सभी संस्थाओं पर एक ढंग से लागू होता है। इसमें धर्म, कम्युनिटी या आइडियोलॉजी के आधार पर अलग नियम नहीं हैं। धार्मिक शिक्षा, धार्मिक स्थलों के रखरखाव और वेलफेयर एक्टविटीज जैसे कामों के लिए विदेशी फंडिंग की इजाजत मिलती रहेगी। धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति के मामले में भी अलग सुरक्षा का प्रावधान है। अगर किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन कैंसल होता है, तो ऐसी संपत्ति उसी धर्म की किसी दूसरी FCRA-रजिस्टर्ड संस्था को दी जा सकती है, ताकि पूजा और धार्मिक गतिविधियां नहीं रुकें।

अमेरिका खुद विदेशी फंड को रेगुलेट करता है
भारत ने अमेरिकी की ओर से किए गए ऑब्जेक्शन के जवाब में यही सवाल किया है। क्वात्रा ने कहा कि अमेरिका में फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA) 1938 से लागू है। फॉरेन अकाउंट टैक्स कंप्लिएंस एक्ट (FATCA) 2010 में आया। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया ने 2018 और कनाडा ने 2024 में संबंधित कानून बनाए। UK ने जुलाई 2025 में इसी तरह की व्यवस्था लागू की, जबकि यूरोपियन यूनियन में भी ऐसा कानून बनाने पर काम चल रहा है। भारत का तर्क है कि विदेशी फंडिंग को सिर्फ भारत ही रेगुलेट नहीं कर रहा। दुनिया के कई देशों में इसके लिए या तो कानून पहले से मौजूद हैं या फिर बनाए जा रहे हैं।
अमेरिका ने FCRA पर क्या आरोप लगाए
FCRA बिल को लेकर अमेरिकी सांसदों की ने आपत्ति की थी। विदेशी मामलों पर अमेरिकी की संसदीय कमेटी के चीफ सीनेटर जेम्स रिश समेत कई सांसदों ने इस कानून में बदलाव को लेकर चिंता जताई। रिपब्लिकन पार्टी के सांसद राइली मूर ने आरोप लगाया कि बिल से चर्चों और रिलीजियस चैरिटी की संपत्तियों को सरकार अपने कब्जे में ले सकते हैं। उन्होंने कहा- ये बिल क्रिश्चियंस पर डाइरेक्ट अटैक है।अगर बिल मौजूदा बदलावों के साथ आगे बढ़ता है तो इसका असर भारत-अमेरिका के रिश्ते पर भी पड़ सकता है।

भारत ने अमेरिका को क्या जवाब दिया
भारत ने साफ कर दिया है कि FCRA में बदलाव कानून बनाने से जुड़ा अंदरुनी मामला है। फॉरेन मिनिस्ट्री के स्पोक्सपर्सन रणधीर जायसवाल ने कहा इस पर फैसला भारत की संसद ही लेगी। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका समेत कई देश विदेशी फंड के फ्लो को रेगुलेट करते हैं। यानी भारत का मैसेज क्लियर है कि FCRA में बदलाव भारत की अपनी कानूनी और सुरक्षा जरूरतों के आधार पर तय होगा।

अब विवाद का असली मुद्दा क्या है
FCRA बिल पर विवाद सिर्फ विदेशी फंडिंग को लेकर नहीं है। असली डर यह है कि विदेशी फंडिंग से जुड़ी संपत्तियों पर सरकार की निगरानी कितनी बढ़ेगी और इसका इस्तेमाल किस तरह होगा। सरकार इसे ट्रांसपेरेंसी और बेहतर गवर्नेंस से जोड़ रही है, जबकि आलोचक इसे NGO और धार्मिक संस्थाओं की आजादी से जोड़कर देख रहे हैं। फिलहाल बिल को लेकर भारत ने अपना रुख साफ कर दिया है। केरल में इसे लेकर सबसे ज्यादा आपत्ति हो रही है क्योंकि वहां पर सबसे ज्यादा ऐसी चैरिटेबल और रिलीजियस संस्थाएं हैं जो स्कूल, अस्पताल समेत कई तरह के वेलफेयर एक्टविटी में लगी हैं। इन संस्थाओं को भरपूर फॉरेन फंडिंग मिलने का दावा भी किया जाता है।

