धर्म के नाम पर नदियों को गंदा करने का अधिकार नहीं: मद्रास हाईकोर्ट का आदेश- जीने के अधिकार का हिस्सा है साफ पानी; थामिराबरानी नदी से निकला था 90 टन कपड़ा
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तस्वीर थामिराबरानी नदी की है। नदी के तटों पर ऐसे दृश्य आम हैं। तस्वीर में दिख रहे कपड़े लोगों द्वारा धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान नदी में फेंके गए थे।
नेशनल डेस्क। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने थामिराबरानी नदी में धार्मिक आयोजनों के दौरान बड़े पैमाने पर कपड़े और अन्य सामान फेंके जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने साफ कहा है कि धर्म के नाम पर किसी को भी नदियों को प्रदूषित करने का अधिकार नहीं है।
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और बी. पुगालेंधी की बेंच ने 9 जुलाई को यह आदेश पारित किया लेकिन यह सुर्खियों में अब आया है। आदेश में कहा गया है कि कि संविधान का आर्टिकल-25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार लोगों की हेल्थ और पर्यावरण संरक्षण के अधीन है। यानी अगर कोई धार्मिक परंपरा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है या दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसे जारी नहीं रखा जा सकता।
कर्मकांड के दौरान नदी में फेंका जाता है सामान
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि तिरुनेलवेली जिले में थामिराबरानी नदी के घाटों पर हजारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों के लिए कर्मकांड करने आते हैं। इस दौरान वे पुराने और नए कपड़े, तौलिए, चप्पल और मृतकों से जुड़े अन्य सामान नदी में बहा देते हैं, जिससे नदी लगातार प्रदूषित हो रही है।
हर दिन नदी में फेंका जाता है 3 से 4 टन कपड़ा
सुनवाई के दौरान कोर्ट को एक रिसर्च रिपोर्ट भी बताई गई। इसके मुताबिक 7 मई से 28 मई के बीच सफाई अभियान में नदी से 86 से 90 टन कपड़े निकाले गए। इसके अलावा 1385 kg प्लास्टिक, 374 kg सैनिटरी पैड-डायपर, 220 kg कांच की बोतलें और 115 kg चप्पलें बरामद हुईं।

नदी में रहने वाले जीवों पर खतरा
हाईकोर्ट ने कहा कि पॉलिएस्टर के कपड़े आसानी से नष्ट नहीं होते। ये नदी की तलहटी में फंसकर बैक्टीरिया पनपने का कारण बनते हैं। नदी में पाए जाने वाले इंडियन ब्लैक टर्टल और इंडियन फ्लैपशेल टर्टल जैसी कछुओं की प्रजाति इन कपड़ों में उलझकर दम घुटने से खत्म हो सकती है।
साफ पानी का अधिकार भी मौलिक अधिकार
बेंच ने कहा कि साफ और प्रदूषण मुक्त पानी का अधिकार संविधान के आर्टिकल-21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। कोर्ट ने तमिलनाडु पब्लिक हेल्थ एक्ट-1939 और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम-1974 का हवाला देते हुए कहा कि सरकार को लोगों को जागरूक करने के लिए युद्ध स्तर पर अभियान चलाना चाहिए।

फिलहाल रोक नहीं, सभी पक्षों को मिलेगा सुनवाई का मौका
हाईकोर्ट ने फिलहाल नदी के तट पर होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों पर तत्काल रोक लगाने का आदेश नहीं दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह मामला बड़ी संख्या में लोगों की धार्मिक आस्था से जुड़ा है, इसलिए अंतिम फैसला लेने से पहले सभी पक्षों को सुना जाएगा।
अदालत ने तिरुनेलवेली जिला कलेक्टर को निर्देश दिया है कि 16 जुलाई को इस मामले की अगली सुनवाई की सार्वजनिक सूचना जारी करें ताकि धार्मिक संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता भी अपना पक्ष रखने के लिए आगे आ सकें। जिला प्रशासन को भी नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए परमानेंट समाधान का प्लान पेश करने के लिए भी कहा गया है।

