ब्रिटेन में भारतीय मूल की महिलाओं को खिलाई रेडियोएक्टिव रोटियां
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ब्रिटेन में गरमाया भारतीय मूल की महिलाओं को रेडियोएक्टिव वाली रोटियां खिलाने का मुद्दा

ताईवो ओवाटेमी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर जांच की मांग करते हुए कहा कि, 'मैं उन महिलाओं और उनकी फैमिली को लेकर चिंतित हूं, जिन पर ये रिसर्च की गई थी।’

हाइलाइट्स :

  • ब्रिटेन में इन दिनों भारतीय मूल की महिलाओं को रेडियोएक्टिव वाली रोटियां खिलाने का मामला गरमा गया है।

  • ब्रिटेन के विपक्षी दल लेबर पार्टी की एक सांसद ने इस मामले की जांच की मांग की है।

  • यह पूरा मामला साल 1960 के दशक का है।

राज एक्सप्रेस। ब्रिटेन में इन दिनों भारतीय मूल की महिलाओं को रेडियोएक्टिव वाली रोटियां खिलाने को लेकर मामला गरमा गया है। ब्रिटेन के विपक्षी दल लेबर पार्टी की एक सांसद ने इस मामले की जांच की मांग की है। जांच की मांग करने वाली सांसद का नाम ताईवो ओवाटेमी है और वह इंग्लैंड के वेस्ट मिडलैंड्स क्षेत्र में कोवेंट्री से सांसद है। ताईवो ओवाटेमी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर जांच की मांग करते हुए कहा कि, 'मैं उन महिलाओं और उनकी फैमिली को लेकर चिंतित हूं, जिन पर ये रिसर्च की गई थी।’ तो चलिए जानते हैं कि आखिर यह पूरा मामला क्या है?

21 महिलाओं पर किया गया था प्रयोग

दरअसल यह पूरा मामला साल 1960 के दशक का है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार साल 1969 में शहर की दक्षिण एशियाई आबादी में आयरन की कमी को लेकर हुए एक शोध के दौरान 21 भारतीय मूल की महिलाओं को आयरन-59 के आइसोटोप्स मिली हुई रोटियां खिलाई गई थी। रोटी खिलाने के बाद ऑक्सफोर्डशायर के एटॉमिक एनर्जी रिसर्च इंस्टीट्यूट में उन महिलाओं के शरीर के रेडिएशन लेवल की जांच की गई थी।

महिलाओं को नहीं दी गई थी जानकारी

रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय मूल की जिन महिलाओं पर यह प्रयोग किया गया था, वह कुछ समय पहले ही ब्रिटेन आई थी। उन महिलाओं को इस रिसर्च के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी गई थी। महिलाएं रेडियोएक्टिव आईसोटोप्स के बारे में नहीं जानती थी। खास बात यह है कि इस पूरे शोध के लिए ब्रिटेन की मेडिकल रिसर्च काउंसिल यानि MRC ने फंडिंग की थी।

संसद में गूंजेगा मुद्दा

सांसद ताईवो ओवाटेमी ने इस मामले को लेकर कहा है कि, ‘सितंबर में संसद का सत्र शुरू होने के बाद मैं इस मुद्दे को संसद में उठाऊंगी। इस मामले की जांच होनी चाहिए कि आखिर ऐसा कैसे होने दिया गया।’ गौरतलब है कि मामले का खुलासा होने के बाद MRC के प्रवक्ता ने कहा था कि, ‘इस मामले की जांच में सामने आया था कि इस शोध से महिलाओं के स्वास्थ्य को खतरा बहुत कम था।’ हालांकि MRC ने यह स्वीकार किया था कि, ‘हो सकता हैं महिलाएं अपने ऊपर होने वाले शोध के बारे में समझ नहीं पाई हो।’

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