ज्ञानेश कुमार को CEC पद से हटाने की तैयारी: विपक्ष एक बार फिर महाभियोग प्रस्ताव लाएगा! 2 हफ्तों के अंदर दोनों सदनों में नोटिस देने का दावा
Published:
4 min read

ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के रूप में पदभार संभाला। उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 को खत्म होना है। (फोटो सोर्स: ANI)
नेशनल डेस्क। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्ष अब संसद में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा है कि विपक्षी दल दोनों सदनों में ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देने की तैयारी में हैं।
रिपोर्ट में कांग्रेस के सूत्रों के हवाले से लिखा गया है कि कांग्रेस ने ही इस मुद्दे पर विपक्षी दलों को अप्रोच किया था। अब अगले दो हफ्तों के भीतर इससे जुड़ा नोटिस लोकसभा और राज्यसभा में दिया जाएगा।
यह कदम ऐसे वक्त में उठाया जा रहा है, जब चुनाव आयोग के अंदर SIR और वोटर लिस्ट से जुड़े फैसलों को लेकर मतभेद की रिपोर्ट सामने आई है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कई फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति जताई थी। विपक्ष इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर CEC के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहा है।
पहले भी आ चुका है ज्ञानेश कुमार को हटाने का नोटिस
यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने CEC को हटाने के लिए संसद का रास्ता अपनाया है। इसी साल मार्च में दोनों सदनों में ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव लाया गया था। इस पर लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने 6 अप्रैल को फैसला सुनाते हुए प्रस्ताव खारिज कर दिया था।
इसके बाद 24 अप्रैल को राज्यसभा में 73 विपक्षी सांसदों ने फिर से नोटिस दिया। इसमें ज्ञानेश कुमार पर भेदभाव के साथ काम करने समेत कई आरोप लगाए गए। ज्ञानेश कुमार पहले ऐसे CEC हैं, जिनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया है।

आखिर अब क्यों बढ़ा मामला?
विवाद की ताजा वजह चुनाव आयोग के अंदर मतभेद की रिपोर्ट है। रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग के तीन सदस्यों में से दो सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कुछ फैसलों पर आपत्ति जताई थी। इनमें SIR के दौरान वोटरों के नाम जोड़ने-हटाने, वोटर डेटा और नए वोटरों के लिए Form 6 से जुड़े बदलाव जैसे मुद्दे शामिल हैं।
विपक्ष का कहना है कि अगर आयोग के ही दो सदस्यों ने फैसलों पर आपत्ति जताई थी, तो इन फैसलों की प्रोसेस और CEC की भूमिका की जांच होनी चाहिए। कांग्रेस के साथ-साथ विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं ने इस मुद्दे पर ज्ञानेश कुमार को CEC पद से हटाने की बात कही। लीडरों ने इस रिपोर्ट के सहारे केन्द्र की मोदी सरकार पर भी निशाना साधा।
विपक्ष ने इस खुलासे को अपने 'वोट चोरी' और 'SIR' के खिलाफ अभियान से जोड़ते हुए पेश किया। तमाम विपक्षी पार्टियों ने अलग-अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि वे कई सालों से चुनावों में हो रही धांधली की शिकायत कर रहे थे और अब नए खुलासे से साबित हो गया कि चुनाव आयोग केन्द्र की मोदी सरकार के दबाव में काम कर रहा है।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग ने अपनी सफाई में कहा है कि किसी मुद्दे पर चर्चा और अलग-अलग राय होना कामकाज की सामान्य प्रोसेस का हिस्सा है। आयोग का दावा है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से ही लिए गए। यानी विपक्ष जहां इन आपत्तियों को गंभीर सवाल मान रहा है, वहीं आयोग का कहना है कि अंदर चर्चा होना किसी विवाद या फैसले में टूट का सबूत नहीं है।
CEC को हटाना आसान नहीं
CEC को हटाने की प्रोसेसे सामान्य सरकारी अधिकारी को हटाने जैसी नहीं है। संविधान के आर्टिकल 324(5) के तहत CEC को हटाने की प्रोसेस सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया जैसी है। इसके लिए संसद में तय नियमों के मुताबिक प्रस्ताव लाना पड़ता है और दोनों सदनों में जरूरी समर्थन हासिल करना होता है। यानी सिर्फ नोटिस देने से CEC पद से नहीं हटते। प्रस्ताव पर आगे की संसदीय प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है।
यह भी पढ़ें...
कश्मीर से अयोध्या और फिर चुनाव आयोग तक: कौन हैं CEC ज्ञानेश कुमार, जिनके कार्यकाल पर उठ रहे सवाल

